एक व्याख्याता अपने विद्यार्थियों को स्ट्रैस मेनेजमेन्ट के बारे में समझा रहे थे. उन्होंने पानी से भरा एक ग्लास ऊपर उठाया और छात्रों से पूछा ‘इस पानी भरे ग्लास में कितना वजन है ’ विद्यार्थियों ने अलग अलग उत्तर दिए. शिक्षक बोले - यह कोई खास बात नहीं है कि इस ग्लास का वजन क्या है. यह इस बात पर निर्भर है कि आप इसे कितनी देर तक उठाए रखते हैं. यदि मैं इसे एक मिनट तक उठाए रखूं तो कोई परेशानी नहीं होगी. एक घंटे तक उठाए रखूं तो मेरा दाहिना हाथ दुखने लगेगा और यदि इसे पूरे दिन उठाए रखूं तो आपको मेरे लिए एम्बुलैंस बुलानी पडेगी. वजन तो वही रहेगा, पर जितनी देर तक मैं इसे उठाए रखूंगा, उतना ही यह भारी होता जाएगा. अत: आपको यह कहना चाहिए कि ऐसी स्थिति में ग्लास को नीचे रख दें , थोडी देर आराम करें और फिर उसे उठालें. इसी प्रकार हमें अपने बोझ को समय समय पर उतार कर रख देना चाहिए , तरोताजा हो कर फिर उठाना चाहिए. अत: जब तुम आज घर लौटो , तो दफ्तर की चिंताओं का भार दफ्तर में ही छोड आना. उसे घर मत ले आना, फिर कल उठ कर काम करना. जो भी बोझ तुम पर है , उसे कुछ क्षण भूल कर तो देखो, कुछ विश्राम लो, फिर देखो उस बोझ का उठाना कितना सरल हो जाएगा.
- संकलित
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