एकांत में नए विचार, संकल्प और स्वप्न जन्म लेते हैं - शैल बक्षीअकेलापन सभी के हिस्से में कभी न कभी जरूर आता होगा, फिर वह इतना भयावह और कारुणिक क्यों लगता है? शायद इसलिए कि हम एकांत के अभ्यस्त नहीं होते. अकेलेपन में नैराश्य और विवशता झलकती है, जबकी एकांत स्वैच्छिक ही नहीं, सानंद भी प्रतीत होता है. हम दोनो मेंसे किसीको भी चुन सकते हैं. कभी ऐसा होता है कि परिचितों की भीड में हम अकेलापन महसूस करते हैं और कभी निपट अकेले हों और खालीपन नहीं लगता. यही एकांतभाव है जो स्थिर करता है, शांति प्रदान करता है. जो एकांत के मर्म को जान ले, उसे खोज ले और उसमें रम जाए, उसके लिए अकेलापन जैसा शब्द ही निरर्थक हो जाएगा. एकांत की चाह में सन्यासियों की तरह सब कुछ त्याग कर वन की ओर कूच तो नहीं कर सकते पर हां, भरपूर जिन्दगी जीते हुए भी वक्त का एक छोटा सा टुकडा सिर्फ अपने लिए चुरा लें. यही क्षण जीवन की दिशा बदल सकते हैं. यह अर्जित अवकाश मन को शांत कर नई ऊर्जा और शक्ति से भर देता है. एकांत में नए विचार, नए स्वप्न और नए संकल्प जन्म लेते हैं और शेष जीवन की नींव तैयार होती है. एकांत का आशय बंद कमरे में चुपचाप बैठने से नहीं है. एकांत की सार्थकता है कि कुछ देर के लिए मुक्त हो जाने दें स्वयं को बंधनों से- खोल दें मन मस्तिष्क के द्वार - साफ करलें अंतर्मन के अंधेरे कोनों को. सर्दियों की सुनहरी(गुनगुनी धूप को अपने भीतर उतर आने दें. शरद की शीतल चांदनी को छिटक जाने दें मन(आंगन में, मखमली हवा का स्निग्ध स्पर्श रूह महसूस कर सके.
प्रकृति पूरे वैभव(संपदा के साथ हमारे अंदर प्रवेश कर चुकी हो तो क्या कोई अकेला रह सकता है? प्रकृति से एकरूप(एकाकार होने का प्रयास , उसके अंश के रूप में स्वयं की स्वीकृति हमारे व्यक्तित्व में अद ्भुत परिवर्तन ला सकती है. जब स्वयं से मिलने की इच्छा हो तो एकांत से बेहतर क्या स्थल होगा? हमारी पूरी जिन्दगी दूसरों को जानने, समझने और उनके साथ ताल-मेल बिठाने में निकल जाती है, पर अपने आप से परिचय बढाने का मौका नहीं मिलता. कभी मिले फुरसत तो खुद के पास बैठें, दिल का हाल पूछें, अपनी उलझनें सुनें, उनका हल खोजें, अपने साथ तारतम्य स्थापित करने का प्रयास करें. खुशियों की लडी बिखेरलें अपने सामने, फिर जतन से एक एक लम्हा पिरोकर सौंप दे खुद को यह अमूल्य विरासत. स्वयं के साथ यह आत्मीयता एकांत को अर्थवान और सुखद बना देती है.
अपने कार्यों और विचारों के सही मूल्यांकन के लिए भी एकांत आवश्यक है. मन जब अनायास ही कर्मो का बहीखाता खोल कर जीवन की सार्थकता पर प्रश्न करता है, तब समय रहते एकांत को आत्मविश्लेषण का सुअवसर बना लेना चाहिए. जीवन की व्यस्तता में हमारे जीवन के शिलालेख अपठनीय हो जाते हैं, वे एकांत के उजाले में ही ठीक से समझे जा सकते हैं. दूसरों के द्वारा हमारे आकलन में असक्ति या द्वेष का रंग हो सकता है, पर एकांत में हम खुद उठ कर आईने के सामने खडे होने का साहस कर सकते हैं.
अन्तरात्मा को मुखर होने दें तो यह सबसे निष्पक्ष विवेचन होगा. क्षणभंगुर जीवन के परे एकांत ब्रम्हज्ञानियों के आत्मसाक्षात्कार का भी साक्षी रहा है. एकांत का हाथ थाम कर वे इस गूढ विद्या की एक एक सीढी पार करते होंगे और कहीं गहरे जाकर एक का अंतट हो , परमात्मा का आभास होता होगा. तभी एकांत जीवनभर का और उसके बाद का भी साथी है, लेकिन इस साथी से परिचय और घनिष्ठता के लिए पहला कदम हमें ही बढाना होगा.
(संकलित)
लेबल: hindi article