संवादहीनता में कई बार बनने वाली बात बिगड भी जाती है - डॉ. संध्या टिकेकर

प्रसिध्द मनोविचारक एडलर की मान्यता है कि व्यक्ति समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए प्राय: दो तरह के रुख अपनाता है. एक सकारात्मक तथा दूसरा नकारात्मक. सकारात्मक रुख अपनाने वाले व्यक्ति, अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को बनाने-बढाने के लिए अपने व्यक्तित्व को आकर्षक बनाते हैं, अधिक से अधिक लोगों से सम्पर्क बढाते हैं, लोक कल्याण के कार्यों में बढ चढ कर भागीदारी करते हैं अर्थात वे अपनी बुध्दि व परिश्रम के बल पर ऐसे रचनात्मक कार्य करते हैं, जिससे वे लोकप्रिय हो सकें. इसके विपरीत नकारात्मक रुख वाले व्यक्ति लोकप्रिय तो होना चाहते हैं, परन्तु उसके लिए रचनात्मक कार्यों से न जुडकर केवल इस प्रतीक्षा में रहते हैं कि लोग उनकी संपन्नता, शारीरिक सुन्दरता तथा पद को ध्यान में रखते हुए उन्हे महत्व देने के लिए स्वयं आगे आएं. ऐसे लोग अहंभाव से ग्रस्त होते हैं. ऐसे व्यक्तियों को जब यथोचित सम्मान, लोकप्रियता नहीं मिलती तो वे संवादहीनता का जीवन जीते हुए कुंठाग्रस्त हो जाते हैं, फलत: डिप्रेशन आदि मनोविकार धीरे धीरे उन्हे जकड लेते हैं.
इन दिनों एक विकृत प्रवृत्ति जो समाज में तेजी से बढ रही है , वह है खुद बात करने की पहल न करना , जो एडलरीय दृष्टि से सामाजिकों का नकारात्मक रुख है. आजकल यह दृश्य आमतौर पर देखने को मिलता है कि लोग सोचते हैं कि हम ही बात करने की पहल क्यों करें? यदि सामने वाले को ज़रूरत होगी तो वह स्वयं ही चलकर हमसे बात करने आएगा.
पार्र्टियों , समारोह , गोष्ठियों में लोग सजधज कर आते हैं , एक दूसरे के आसपास खडे हो कर खाते-पीते हैं , पर आपस में बात किए बिना चले जाते हैं. जो दो चार गुट आपस में चर्चा करते नज़र आते हैं, वे भी स्वार्थवश ऐसा कर रहे होते हैं.
सहजता से , निस्वार्थ भाव से एक-दूसरे का हाल पूछने का दौर लगभग खत्म होता जा रहा है. संवादहीनता का यह स्वरूप समाज में चलन का रूप लेता जा रहा है. वार्ता में पहल न करने की प्रवृत्ति के पीछे सबसे बडा कारण व्यक्तिवादी प्रभाव की तीव्रता है. आज मध्यम तथा उच्च वर्ग का अधिकांश व्यक्ति सुख-सुविधाओं से संपन्न है. अभाव जहां व्यक्तियों को निकट लाता है , सुविधा संपन्नता उन्हें एक दूसरे से दूर ले जाती है. सुविधा-संपन्न समझते हैं कि उन्हें भला किसी की आवश्यकता क्यों पडेगी. व्यक्तिवादी प्रभाव ने लोगों के अहं को गहरा किया है अहं में डूबे व्यक्ति सोचते हैं कि यदि मैंने बात की पहल की तो सामने वाला सोचेगा कि मेरा ही कोई काम अटका है. वास्तव में इस प्रकार की सोच , एक तरह की हीन ग्रंथि है , जिसमें सारा समाज धीरे-धीरे जकडता जा रहा है नतीजन समाज में संवादहीनता बढती जा रही है , जिससे एक दूसरे के प्रति भ्रामक धारणाएं भी पनप रही हैं.
प्रकृति ने यदि मानव को वाक्-शक्ति दी है , तो वह सप्रयोजन है. वाक-शक्ति आत्म उत्थान एवम् परोपकार का सशक्त माध्यम है. गले के कॅन्सर से पीडित स्वामी राम कृष्ण परमहंसजी को जब डॉक्टर ने बिल्कुल भी न बोलने की सलाह दी तो उनका जवाब था -मेरे पास वाणी ही तो एकमात्र ऐसा साधन बचा है , जिससे मैं अधिक से अधिक लोगों के मनों को जोड सकता हूं , इसलिए मुझे बोलने से न रोकें.
तात्पर्य यह कि अब हमें ही यह तय करना है कि संवादहीनता में जीते हुए हम कुंठित (मनोविकार वाले) समाज रचना की ओर प्रवृत्त हों अथवा अहं जडित संवादहीनता को तोडकर वाणी का सार्थक प्रयोग करें.

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प्रेषक : साईट प्रबंधन गुरुवार, 24 मई 2007 12:50 am.